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महानगर की धूप


"क्या बात हैआजकल आती नहीं हो इधर। पहले तो आंगन भर-भर आती थी। दादी की तरह छत पर पसरी रहती थी हमेशा। पड़ोसियों ने अपनी इमारतों की दीवार क्या ऊँची की तुम तो इधर का रास्ता ही भूल गयी। अक्सर सुबह देखता हूंपड़ी रहती हो आजकल उनके छज्जों पर। हमारी परछती तो अब तुम्हें सुहाती ही नहीं ना। लेकिन याद रखोऊँची इमारतों के ऊँचे लोग बड़ी सादगी से लूटते हैं। फिर चाहे वो इज्जत हो या दौलत। "
महीनों ने बाद मिली थी। सो सारी शिकायतें सुना डाली। उसने कुछ बोला नहीं। बस हवा में खुशबु घोल और शर्मो - हया का नकाब ओढ़ खिड़की के पीछे चली गई। सोचा कि उसे पकड़कर ओक में भर लूँ। धत्त तेरी की .....फिर गायब ....ये महानगर की धूप भी न ...बिलकुल तुम पर गई है ....हमेशा चीटिंग करती है .

सिग्नल वाली लड़की

(यह कहानी समाचार पत्रों, चैनलों और रोजमर्रा की घटनाओं से प्रेरित है जिसका नाट्य रूपांतरण किया गया है। इसका सिर्फ और सिर्फ "जिन्दा व्यक्तियों" से ही सम्बन्ध है। उम्मीद है आप "जिन्दा व्यक्ति" और "जीवित व्यक्ति" के बीच का अंतर समझते होंगे। भाषा अश्लील हो सकती है लेकिन कोशिश कीजियेगा भाव समझने की )
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ब्लैक उलझे बाल, इंटेंस सोगवार आँखें और सूखे सुर्ख अधर। खूबसूरती का ये सबसे "खतरनाक कॉकटेल" होता है। और इस "खतरनाक कॉकटेल" से मैं अक्सर रूबरू होता साकीनाका सिग्नल पर। इत्तेफाकन और कभी कभी इरादतन। ट्रैफिक हवलदार मुझे तुम्हारा "वो" समझता। सिग्नल के पास एक आढ़े-तिरछे पत्थर पर बैठी हुई होती तुम जैसे नन्हीं डूब पर बैठी ओंस की कोई एक बूंद। तुम्हारा बेनूर चेहरा इस  बात की ताकीद करता कि तुम्हें सिग्नल की हरी लाइट से बेइंतहा नफ़रत थी। और जब यही लाइट लाल में तब्दील होती तो तुम्हारे हुस्न की रंगत में एक अजीब सी लालिमा आ जाती जिसे देख डूबते सूरज को भी रश्क हो जाता। तुम हाथों में कुछ सामान लिए निकल जाती वाहनों के कारवां के बीच। कभी इतराती, कभी बलखाती, कभी मुस्कुराती तो कभी मायूस हो जाती। उफ्फ ! कातिल अदाओं की ऐ कमज़र्फ़ वैरायटी। शायद तुमसे किसी ने कहा होगा कि तुम "यूं" करो तो "यूं"  होगा। जिस किसी ने भी कहा हो, वह बंदा था बेहद इंटेलीजेंट। उसे बखूबी पता था कि शराफत के कपड़े अब कोठियों पर नहीं सिग्नलों पर उतरते हैं। खैर, जब से पवई शिफ्ट हुआ हूं, इधर आना जाना थोडा कम हो गया था। तकरीबन तीन महीने बाद इधर से गुजरा। तुम दिखी नहीं। ट्रैफिक हवलदार से पूछा तो उसका जवाब अन्दर सुन्न कर गया "यह जंगली जानवरों का शहर है साहब। यहाँ कीड़े-मकोड़ों को या तो मार दिया जाता है या मार लिया (रेप ) जाता है। दो महीने पहले कुछ लोगों ने उसका रेप कर सर को कुचल दिया ताकि पहचान न हो सके ..........." वो बोलता गया। वाहनों का वाइलन्ट साउन्ड हवा में सरगोशियाँ कर रहा था। मगर मेरे अन्दर कुछ टूट  रहा था।  दर्द का लिहाफ ओढे स्याह एहसास  के लबों पर एक अजीब सी खामोशी थी। एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था .....एक सर्द सन्नाटा ...जरुर तुमने उनके "यूं " का विरोध किया होगा। 

इस प्यार को क्या नाम दूं

(1)
सालों पहले
"बेवा सी लगती हो तुम। आँखों में काजल लगाया करो। गेसुओं में गजरे सजाया करो। नुमाइश का दौर है, तुम भी दिखावा करो " मैं उसे अक्सर शिकायती लहजे में चिढ़ाता। और फिर "गुनाहों का देवता " के सफ़हे पलटने में मशगूल हो जाता। थोड़ा सा पढ़ चुका था और थोड़ा बाकी था। वो मेरे मास्टर साहब की लाडली बेटी थी। शांत, सौम्य, सादगी से पुररौनक चेहरा। मेरी शिकायत पर हलके से मुस्कुरा देती।
ख्वाईशें उसे देख जवां हो रही थी और हसरतें उसे लेकर एक जहां बना रही थी।
(2)
सालों बाद
"बला की खुबसूरत लग रही हो तुम। ठीक सर्द मौसम में छत पर उतरती धूप की तरह। लफ़्ज़ों के समंदर में हसरत-ए -बयान की अनलिमिटेड मौजें उछल-कूद करने लगी हैं। तारीफें अपनी हद पार कर ले तो बुरा न मानना। सच कहता हूं, यूँ लगता है कि जैसे किसी ने चांद के कई टुकडे कर तुम्हारे जिस्म में उतार दिया हो। " किसी और के नाम की मेहंदी हाथों में सजाये वो दुल्हन के लिबास में बैठी थी। हालाँकि मुझे तुम्हारी सादगी ही पसंद थी। फिर भी मैं बुदबुदाये जा रहा था। दूर कहीं से आवाज़ आ रही थी "जो दिल गँवा चुके तुम उस दिल को ढूंढते हो, इस सादगी के सदके कातिल को ढूंढते हो" "गुनाहों का देवता " मैंने पूरी पढ़ ली थी। सो तुम्हे थमा दिया ताकि इसे पढ़ने के बाद शायद तुम मेरे भीतर का द्वन्द समझ सको।
मैं तुमसे दूर चला गया। ख्वाईशें दम तोड़ गई और हसरतों का जहां अपनी आख़िरी सांसे लेने लगा।
(3)
आज कुछ साल बाद
शेल्फ से किताबें निकल रहा था। कोने में दुबक कर बैठी एक किताब पर नज़र पड़ी। उठाकर देखा तो मेरी प्रिय पुस्तक थी "गुनाहों का देवता ".......शायद तुम छोड़ गयी थी। सफ़हें पलटा तो एक चिट मिली थी जिस पर लिख था "मुझे सोलह श्रृंगार करना पसंद नहीं था क्योंकि मैं तुम्हारे साथ थी तो खुबसूरत थी "
ख्वाईशें कुछ पल के लिए कोमा से बाहर आई और फिर कोमा में चली गई।

मैं और तुम्हारा तकिया

अच्छा सुनो...आज तकिये से थोड़ी तनातनी हो गयी..कमबख्त आधी रात को भुनभुना रहा था..वज़ह पूछा तो हिदायती लहजे में बोल उठा "यार ये किस्सी विस्सी मत किया करो"...अब उससे कैसे कहूँ कि उसकी पेशानी पर जो गीलापन है वो किसी "किस्सी विस्सी" की वज़ह से नहीं बल्कि दर्द के उस बर्फीले बादल की वज़ह से है जिसे सालों पहले तुम इन बावली आँखों में छोड़ गयी थी ...दर्द का यही बादल वक्त-बेवक्त बरसता रहता है...और तुम तो जानती ही हो कि रीते हुए दर्द की उम्र थोड़ी लम्बी होती है...काश दिल का अपना कोई मानसून होता..कम से कम बरसने की खबर तो होती और हम भी एहतियात बरतते ..वैसे हम भी बड़े बवाले हो गए हैं..तुम्हारे लिए सजीव चीजों से लड़ते लड़ते निर्जीव चीजों से भी दुश्मनी मोल लेने लगे हैं...